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कथनी व करनी में एकता सिखायी पिताश्री ब्रह्माबाबा ने - ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

 

नारी शक्ति के प्रणेता रहे पिताश्री

ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में पिताश्री ब्रह्माबाबा की 51वीं पुण्यतिथि मनाई गई...

पूरे विष्वभर के सेवाकेन्द्रों में विष्व शान्ति दिवस के रूप में मनाया गया यह दिन

पिताश्री के कर्म रूपी 18 कदम सुनाकर सभी को दी गई प्रेरणाएं...

बिलासपुर टिकरापारा, 18 जनवरी- प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईष्वरीय विष्व विद्यालय के साकार संस्थापक पिताश्री ब्रह्माबाबा की 51वीं पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने कहा कि पिताश्री त्याग और तपस्या के मूरत थे। परमात्मा के श्रीमत के अनुसार नारी शक्ति को आगे करते हुए संस्था की बागडोर बहनों व माताओं का ट्रस्ट बनाकर उन्हें सौंप दिया और 18 जनवरी 1969 को 93 वर्ष की उम्र में अपना साकार देह का त्याग कर सम्पूर्णता को प्राप्त हुए। उनकी पुण्यतिथि को पूरे विष्वभर के सेवाकेन्द्रों में विष्व शान्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है। पिताश्री जी की पुण्यतिथि पर अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि देने के लिए शहर के साथ-साथ आसपास के गांव से भी साधक गण टिकरापारा सेवाकेन्द्र पहुंचे और उनकी याद में बनाए गए स्मृति चिन्ह ‘षान्ति स्तम्भ’ के प्रतिरूप के समक्ष उनके नक्षेकदम पर चलने का संकल्प लेते हुए विनम्र श्रद्धांजलि दी। जनवरी महीने को तपस्या का माह मानते हुए टिकरापारा के आसपास के साधक सेवाकेन्द्र में प्रातः 4 से 5 बजे तक योग साधना के लिए पहुंचते हैं। इस योगाभ्यास में 20 मिनट साइलेंस में भगवान की याद, 5 मिनट विष्वषांति के लिए योग दान, 10 मिनट अपने पांच स्वरूप - आत्मिकस्वरूप, दैवीय स्वरूप, पूज्यस्वरूप, भगवान के बच्चे और प्रकाष के फरिष्ते स्वरूप का अभ्यास, 10 मिनट चार धाम की यात्रा, 10 मिनट भगवान के द्वारा अपने शहर व परिवार के सदस्यों को शक्ति दिलाना व 5 मिनट प्रतिदिन सत्संग पर आधारित स्वमानों का अभ्यास शामिल किया जाता है।
सभी उपस्थित सभा को पिताश्री जी की प्रेरणादायी जीवन कहानी उनकी विषेषताओं व कर्म रूपी 18 कदमों के रूप में सुनाते हुए दीदी ने कहा कि सबको प्यार तथा सम्मान देकर आगे बढ़ाना, हर ईष्वरीय कार्य पर चलना और चलाना, हर एक के गुण व विषेषताओं को देख उन्हें सेवाओं में लगाना, स्वयं मेहनत करके दिखाना, हर एक को खुषी में लाना और हल्का करना, आलस्य-अलबेलेपन से अतीत व निद्राजीत, मैं-पन का सम्पूर्ण त्याग, सर्वश्रेष्ठ योगी, सदा निष्चिंत और अचल स्थिति, सदा आनंदित रहना, सागर समान गंभीर विचार, सादगीपूर्ण जीवन और सद्व्यवहार, स्नेह, संरक्षण और सहायता देने में निपुण, सभी में योग्यता भरने की कला, देहातीत बनाने वाली शक्तिषाली दृष्टि, ज्ञान और प्रेम का अद्भूत संतुलन, सुख-दुख हर परिस्थिति में परमात्मा की याद, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना आदि उनके जीवन की विषेषताएं रहीं।
दीदी ने बताया कि स्वयं निराकार परमपिता परमात्मा षिव अपने साकार माध्यम प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग की षिक्षा देकर नई सतोप्रधान दुनिया की पुनर्स्थापना करा रहे हैं। परमात्मा द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर पिताश्री ने समाज को नई दिषा दी है। दीदी ने सभी उपस्थित नियमित साधकों को संस्था के नियम व मर्यादाएं दोहराकर धारणाओं की ओर ध्यान खींचवाया। सभी को ब्लेसिंग कार्ड दिया गया।
इस अवसर पर मकर संक्रांति व पिताश्री जी की पुण्यतिथि का संयुक्त भोग लगाया गया व सभी को तिल का लड्डू, केला व गाजर-दूध व वितरित किया गया।



Posted By:Utpal Sengupta






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