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मैंने पुच्छल तारा देखा है और मैंने द्रविड़ को ज़मीन पर अपनी टोपी पटकते देखा है

आईपीएल 2014. छप्पनवां मैच. मुंबई इंडियंस वर्सेज़ राजस्थान रॉयल्स. मुंबई इंडियंस यानी ऑथेंटिक शोरूम से खरीदी गयी महंगी टीम. जहां डिस्प्ले में लगा एक-एक आइटम अपने आप में ट्रेंडसेटर हो. और वहीं राजस्थान रॉयल्स यानी हफ़्ते में दो बार लगने वाली मार्केट में हर माल दस रुपये वाले ठेले से उठाकर लाई गयी टीम. एक-दो चेहरों के अलावा सभी अनजाने लोग. अगर वो क्रिकेट की बजाय हॉकी भी खेल रहे होते तो किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता. मगर मैदान पर उस दिन सभी को फ़र्क पड़ रहा था. ये वो टीम थी जिसने सबसे पहला आईपीएल जीता था. और अब इस टीम को एक ऐसा इंसान मेंटर कर रहा था जो उस वक़्त डग-आउट में बैठा मैच के आखिरी चंद लम्हे देख रहा था. शायद सबसे कसे, टेंस लम्हे…

मैच कड़ा था. मुंबई या राजस्थान रॉयल्स. कोई एक ही आगे क्वालिफाई कर सकता था. मुंबई को एक गेंद पर एक बाउंड्री चाहिए थी. चाहे चार हो या छह. बस एक बाउंड्री. राजस्थान को वही बाउंड्री बचानी थी. आदित्य तारे स्ट्राइक पर. गेंद जेम्स फॉकनर के हाथ में. जेम्स अपने रन-अप पर. सर्कल में उतने ही प्लेयर जितने कम से कम हो सकते थे. बाकी सभी बाउंड्री पर. क्यूंकि बाउंड्री ही रोकनी थी. उलटे हाथ से फेंकने वाला जेम्स फॉकनर. ओवर द विकेट. राइट हैण्डेड तारे के लिए. लेग स्टम्प से आठ बित्ते बाहर. फुल-टॉस. तारे ने बल्ला घुमाया. छह रन!

मुंबई इंडियंस क्वालिफाई कर चुकी थी. बाउंड्री पर खड़े फील्डर्स, बाउंड्री पार वालों की ही तरह दर्शक बने खड़े रहे. फर्क बस इतना था कि बाउंड्री के पार खड़े लोग चीख रहे थे. मगर ये फील्डर्स चुप थे. बाउंड्री पर पड़ी रस्सी के ठीक बराबर में बैठा एक आदमी उठा. नाम – राहुल द्रविड़. उसके उठने में एक बेचैनी थी. साथ ही अविश्वास. इस बात का, कि ऐसे अहम मौके पर कोई ऐसी गेंद कैसे फेंक सकता है? तिस पर वो गेंदबाज जो डेथ बॉलिंग में सबसे मारक माना जाता है. वो आदमी उठता है. उसकी मेहनत उसकी टीम को इस हालत तक खींच के लाई थी. लिहाज़ा उसके उठने में और भी गुस्सा घुला हुआ था. और ये गुस्सा उससे उसके सर पर लगी हुई टोपी को उतरवाता है. वो टोपी को उतार ज़मीन पर पूरी ताकत से पटक देता है.

 


ठीक इसी समय दो बातें हुई थीं. राहुल द्रविड़ को पूरी दुनिया ने एक गलती करते हुए देखा था. और मैंने ये महसूस किया था कि ये भी एक इंसान है. इसमें पहली बात ज़्यादा ज़रूरी मालूम देती है. जब मैं छोटा था तो एक रात पापा मुझे बाहर ले गए. कहने लगे कि टहल कर आते हैं. इतनी रात में टहलना काफी असामान्य था मगर मेरे लिए ये एक मज़ेदार ख़याल था. लिहाज़ा मैं चला गया. पापा ने बाहर जाकर आसमान में कुछ दिखाया था. बचपन के कुछ चित्र आपके मन में वैसे के वैसे ही छप जाते हैं. मेरे मन में भी उस रात का वो चित्र छपा हुआ है. एक पुच्छल तारा. मुझे बताया गया कि ऐसा तारा मुझे 42 सालों बाद देखने को मिलेगा. द्रविड़ का ज़मीन पर टोपी फेंकना उसी पुच्छल तारे को देखने जैसा है. वो तारा मुझे 42 सालों बाद देखने को मिलने वाला था. द्रविड़ को टोपी ज़मीन पर फेंकते या वैसा कुछ भी करते मैं तो क्या कोई भी दोबारा नहीं देखने वाला था.


जब भी द्रविड़ की बुरी साइड के बारे में बात होती है. हमेशा ये एक घटना सबसे ऊपर होती है. और यही द्रविड़ के क्रिकेट जीवन का फ़लसफ़ा है. उसने टोपी को ज़मीन पर फेंककर अपने जीवन की सबसे खराब हरकत की. उसके अलावा उसने सब कुछ वैसा ही किया जैसा एक आदर्श दीवार करती है. आप उसपर लाख ठोकरें मारिये, वो चुप-चाप सहती जाती है. उल्टे अक्सर चोट आपको ही लगती है. और ऐसा ही हुआ जब 2004 के पहले ही हफ़्ते में सिडनी में ब्रेट ली ने एक बाउंसर द्रविड़ की कनपटी पर दे मारी. द्रविड़ के कान से खून बह रहा था. ब्रेट ली उन्हें चोट लगते ही उनके पास आकर उनसे उनका हाल जान चुके थे. सौरव गांगुली ने तुरंत ही इनिंग्स डिक्लेयर कर दी. मैदान से वापस लौटते वक़्त

 

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जितनी बार ब्रेट ली ने द्रविड़ को सॉरी नहीं कहा उससे ज़्यादा बार द्रविड़, ली को ये समझा चुके थे कि सब कुछ ठीक है. वो उन्हें ये बताने की कोशिश में लगे हुए थे कि ऐसा खेल में होता रहता है. उन्हें मालूम था कि ब्रेट ने वो गेंद जानबूझ कर उनके कान पर नहीं दे मारी है और इसीलिये ली को चिंता करने की कोई बात नहीं है.

मैच ड्रॉ हुआ. सालों बाद करियर खतम हो जाने के बाद ली ने कहा, “अगर आप द्रविड़ के साथ सामंजस्य नहीं बिठा सकते तो आप अपनी ज़िन्दगी में बहुत पिछड़े हुए हैं.” और ये एक ऐसा आदमी कह रहा था जिसे बैट्समैन को बैक फुट पे धकेल देने के लिए जाना जाता था.


राहुल द्रविड़. यानी दीवार. एक फ़ास्ट बॉलर दौड़ कर अपनी सारी जान झोंककर गेंद फेंकता था. गेंद गुड लेंथ पर ऑफ स्टंप की लाइन से हल्का सा बाहर पड़कर बाहर की ओर निकलती थी. बॉलर इस गेंद पर बैट्समैन को लालच देकर उससे बल्ले का किनारा चाहता है. मगर राहुल द्रविड़ अपने कंधे खड़े कर देते हैं और गेंद को कीपर के दस्ताने में जाते हुए देखते हैं. बॉलर की इतनी मेहनत पर द्रविड़ का गेंद को यूं ही छोड़ देना वैसा ही लगता था जैसा स्कूल से वापस आने पर मम्मी को टिफ़िन बॉक्स में पूरा खाना वैसा का वैसा ही मिलना. तब मम्मी पूछती थीं, “बेटा इतनी मेहनत से सुबह खाना बनाया, तुमने खाया नहीं?” राहुल द्रविड़ का वो लीव भी कुछ वैसा ही था.


बात चाहे लेट कट की हो या बैकफ़ुट डिफ़ेंस की. द्रविड़ एक डिक्शनरी की तरह मौजूद रहेंगे. उनके पास इन मसलों में हर सवाल के जवाब हैं. जब टीम को ज़रुरत पड़ी तो वैसा ही किया. टीम को एक कीपर चाहिए था. वर्ल्ड कप के लिए जाना था. हाथ खड़ा कर दिया. कीपर बन गए. साढ़े तीन साल से ज़्यादा कीपिंग की. टीम को एक कप्तान चाहिए था. दादा चल पड़े थे. किसी ठंडे दिमाग की ज़रुरत थी. फिर से आगे हो गए. कप्तानी संभाल ली. एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया के साढ़े पांच सौ रन को चुनौती देने की बात आई तो ढाई सौ से कुछ कम रन बना दिए. मैच जितवा दिया.

 

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हेलमेट को हल्का सा दबाता था तो पसीना चूता था. चूता भी नहीं था, भलभला के गिरता था. इनके बचपन की एक कहानी फ़ेमस है. दो दिन राहुल द्रविड़ कॉलेज में ग्लव्स पहन कर आया था. ग्लव्स पहन कर ही नोट्स बनाये, ग्लव्स पहन कर ही अगले दिन इग्ज़ाम दिया. पूछा गया कि ऐसा क्यूं कर रहा है तो बताया कि नए ग्लव्स हैं और अगले दिन रणजी फाइनल है. पुराने ग्लव्स से ऐसी आवाज़ निकलती है कि गेंद बल्ले पर न लगे फिर भी लगता है कि किनारा लगा है. इसलिए नए ग्लव्स से फाइनल खेलना था. नए ग्लव्स कड़े होते हैं तो उन्हें सॉफ्ट करना भी ज़रूरी था. इसलिए द्रविड़ ने दो दिन वो ग्लव्स ही नहीं उतारे. फाइनल में द्रविड़ की सेंचुरी लगी और कर्नाटक रणजी ट्रॉफी विजेता बन गया.


 एमटीवी ने एक प्रैंक किया. एक लड़की द्रविड़ के कमरे में घुस आई और द्रविड़ को बताने लगी कि वो उन्हें कितना पसंद करती है. वो उनसे शादी करने को कह रही थी. द्रविड़ सकपकाए हुए थे. मगर द्रविड़ के बेसिक्स दुरुस्त थे. उन्हें भड़भड़ाती इनिंग्स को संभालना आता था. वही उन्होंने वहां भी अप्लाई किया. लड़की को समझाया. उसे कहा कि वो अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. ये सब कुछ बाद की बातें हैं. बाद में जब उन्हें मालूम चला कि वो एक प्रैंक था तो इस कदर शर्माए जैसे सचमुच शादी तय हो गयी हो.

मैनचेस्टर में मैच हुआ. इंडिया वर्सेज़ इंग्लैंड. राहुल द्रविड़ अपना पहला टी-20 मैच खेल रहे थे. ये वही राहुल द्रविड़ था जो टुक-टुक के नाम से फ़ेमस था. जिसने गेंदें छोड़ छोड़ के कितने बॉलर्स के दिमाग को मार दिया. ग्यारहवें ओवर में एक के बाद एक तीन छक्के मारे. राहुल द्रविड़ मार रहा था. एक लेफ़्ट आर्म स्पिनर को. क्यूं? क्यूंकि ऐसे ही खेल की ज़रुरत थी. हर्षा भोगले ने माइक थाम रखा था. बोले, “आज राहुल द्रविड़ को पानी पर चलने के लिए कहिये तो वो पूछेंगे, कितने किलोमीटर?” चैम्पियंस लीग टी-20 फाइनल. साल 2013. राजस्थान मुश्किल में थी. उन्हें अगर कुछ बचा सकता था तो वो थी ऐसी बैटिंग जो तबाही ला दे. दूसरी गेंद खेल रहे थे. स्लॉग मारा. गेंद लम्बी लेंथ की थी इसलिए विकेट्स में जा लगी. एक रन पर आउट. हर्षा भोगले ने इस बात पर जो कहा वो राहुल द्रविड़ की पूरी तस्वीर पेश करता है. “एक ऐसा करियर जिसे सुन्दरता और स्टाइल ने सजाया है, आज एक स्लॉग के साथ खतम हो रहा है. मगर बात ये है कि इस वक़्त इसी की ज़रुरत थी.”

राहुल द्रविड़ यानी भरोसा. राहुल द्रविड़ यानी विश्वास. राहुल द्रविड़ यानी हर चुनौती पार कर लेने की हिम्मत. राहुल द्रविड़ यानी दीवार. वो दीवार जिससे कितनी ही गेंदें टकराईं और वहीं गिर पड़ीं. जब ज़रूरत पड़ी तो द्रविड़ काम आये. मिस्टर डिपेंडेबल बनकर. द्रविड़ के बारे में बात करो तो एक अलग इमोशन उभर कर आता है. उनके जाने के बाद में हमें वो खाली जगह सुझाई दी जिसे भरने की कवायद में इंडिया आज भी जूझ रहा है. राहुल द्रविड़ यानी वो आदमी जो इस बात पर गर्व करता है कि उसने ही अपनी मां को पीएचडी की डिग्री मिलते वक़्त फ़ोटो खींची थी. राहुल द्रविड़ यानी वो आदमी जिसके बारे में मैथ्यू हेडेन ने कहा था, “ये आज कल जो कुछ भी चलता है इसे अग्रेशन नहीं कहते हैं. अगर आपको अग्रेशन देखना है तो राहुल द्रविड़ की आंखों में देखिये जब वो टेस्ट मैच में बैटिंग कर रहा होता है.”

मेरे दोस्त अमित ठाकुर का कहना है कि उसे आश्चर्य होता है कि राहुल द्रविड़ जैसे लोग भी पैदा हो सकते हैं. जैसे वो खेलता था, लगा कि किसी लैब में लाखों करोड़ों खर्च करके, हजार डेढ़ हजार साल मे सौ देशों ने मिलकर बनाया होगा.

राहुल द्रविड यानी वर्ल्ड क्रिकेट को एक तोहफ़ा.



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