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आध्यात्म और ज्योतिष

मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य भगवान में विलय करना है। इसे मोक्ष कहा जाता है। ज्योतिष विद्या का प्रयोग कर हम किसी व्यक्ति विशेष की कुंडली में छुपी संभावनाओं का अध्ययन कर सकते है, इसके द्वार हम आध्यात्मिक स्तर को प्राप्त करने की संभावनाओं को जान सकते है। आध्यात्मिकता के आधार पर आत्मा की परिपक्वता को जाना जा सकता है। यह जानने में ज्योतिष विद्या विशेष सहयोगी हो सकती है। क्या कोई व्यक्ति गुरु प्राप्त क सकता हैं या नहीं? यह जानना भी संभव है कि आधात्मिक रुप से कोई व्यक्ति कितना सक्षम है। जिस प्रकार कुंडली से कुंडली में छुपे शुभ/अशुभ योगों को जाना जा सकता है, ठीक उसी प्रकार से व्यक्ति की धार्मिक आस्था और आधात्मिक उन्नति का आंकलन भी कुंड्ली अध्ययन से जाना जा सकता है। हम यह नहीं जानते है कि हम सबेहे ने जन्म क्यों लिया है? हम यह जीवन को क्यों जी रहे है। मृत्यु के बाद हमारा क्या होगा?

 

ज्योतिष का उपयोग करके, हम किसी व्यक्ति की कुंडली में तत्वों का अध्ययन कर सकते हैं और आध्यात्मिक प्राप्ति के अपने स्तर को तय कर सकते हैं। आध्यात्मिक ज्योतिष आत्मा की परिपक्वता जानने के लिए कुंडली के अध्ययन से संबंधित है। यह जानना भी संभव है कि क्या कोई व्यक्ति गुरु प्राप्त कर सकता है या नहीं। आध्यात्मिक ज्योतिष के लिए एक उदाहरण के रूप में, हम परमहंस योगानंद की कुंडली का अध्ययन करेंगे। हम में से अधिकांश यह नहीं जानते कि हमने इस जन्म को क्यों लिया है, हम इन जीवन का नेतृत्व क्यों कर रहे हैं, मृत्यु के बाद क्या होता है और हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है। हम सभी सामान्य लोग मानव जीवन के मूल सिद्धांतों के ज्ञान के बिना हैं। लेकिन एक आध्यात्मिक व्यक्ति इन सभी सवालों के जवाब जानता है।

 

हम सभी ऊर्जा के एक विशाल लोक से इस धरा पर अवतरित हुए है, जिसे 'परमात्मा' या 'आत्मा' कहा जाता है। उस सर्वोच्च आत्मा को ईश्वर ने मनुष्य के रुप में अनेक छॊटी छॊटी ऊर्जाओं में विभाजित किया है। ऊर्जा के इसी सूक्ष्म अंश को बॉडी सोल के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक जीवात्मा एक भौतिक शरीर का निर्माण करती है। और जीवात्मा कर्म के माध्यम से अपनी क्रियाएं करती है। इसी से व्यक्ति के शुभ अशुभ कर्मों का फल प्राप्त होता है। जो अंत में चेतना के स्तर का विस्तार करती हैं।

 

अपनी जीवन यात्रा में जीवात्मा को पता चलता है कि ईश्वर से अधिक जानने के लिए कुछ भी नहीं है, इसे जानने के बाद ही आत्मा उच्च चेतना तक पहुंच जाती है, जहां सर्वोच्च आत्मा में लीन हो जाती है। जिसे मोक्ष के रुप में जाना जाता है। हम भी इस धरा पर जीवात्मा के रुप में हैं और इस दुनिया में हमारे होने का उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है। एक सामान्य व्यक्ति को इस अवथा तक पहुंचने में 1,00,000 से अधिक जन्म लगते हैं। एक योगी या आध्यात्मिक व्यक्ति इस अवस्था में 3 साल तक प्रतिदिन 8 घंटे ध्यान लगाकर पहुँचा जा सकता है। भगवत गीता के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करते हैं-

 

महाभारत के युद्ध के समय इस धरा पर जीवात्मा का प्रतिनिधित्व अर्जुन कर रहा है, यह रथ रुपी भौतिक शरीर में निवास करता है। इस रथ का संचालन ५ इंद्री रुपी घोड़ों के द्वारा हो रहा है। यहां ईश्वर की भूमिका स्वयं भगवान श्रीकॄष्ण कर रहे है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन रुपी जीवात्मा को स्वयं तक अर्थात मोक्ष तक पहुंचने का मार्ग समझा रहे है। जीवन की बागडोर कॄष्ण के हाथों में है, यह मन को नियंत्रित करने की क्रिया है। जीवन की लड़ाई कौरवों (राक्षसी प्रकृति) और पांडवों (दिव्य प्रकृति) के बीच है - ये दोनों मन के दो पहलू हैं। युद्ध को जीतना इंद्रियों को नियंत्रित करने और योग के माध्यम से मन को शुद्ध करने से ही संभव है। तब केवल जीवात्मा ही परमात्मा की स्थिति को प्राप्त कर सकता है। ऐसा व्यक्ति जो परमात्मा बनने की राह में है, उसे 'आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध व्यक्ति' कहा जाता है। आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध व्यक्ति वह व्यक्ति है जो नित्य योग का अभ्यास करता है, सांसारिक आसक्तियों से मुक्त हो जाता है, कई जन्मों की पूर्णता प्राप्त करता है और अंत में अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

 

ऐसा व्यक्ति उन व्यक्तियों से श्रेष्ठ होता है जो तपस्या करते हैं, वह वैदिक विद्वानों से श्रेष्ठ है। वह उन व्यक्तियों से भी श्रेष्ठ है जो वैदिक अनुष्ठानों को सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए करते हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे अर्जुन, आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध बनो! एक आध्यात्मिक व्यक्ति जानता है कि वह भौतिक शरीर नहीं है, बल्कि जीवात्मा है। इस जीवात्मा को किसी शारीरिक सुख की आवश्यकता नहीं है और इसलिए उसे सांसारिक भोगों को प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं है। वह मन और आत्मा की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करता है।

 

इस उद्देश्य के लिए, उन्हें 'गुरु' (ईश्वरीय मार्गदर्शक) की आवश्यकता होती है। एक गुरु वह व्यक्ति है जिसने पहले ही सर्वोच्च आत्मा बनने का अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। गुरु मंत्रों का पाठ करने, योग और ध्यान करने जैसी कुछ प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है, अंत में, व्यक्ति की चेतना यह जानने के लिए बढ़ जाती है कि वह सर्वोच्च आत्मा है, केवल यही एक ऊर्जा संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। 

 

ज्योतिष शास्त्र से यह जानना संभव है कि क्या कोई व्यक्ति सांसारिक सुखों को पाने का प्रयास कर रहा है या जातक आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचने की प्रक्रिया में है या नहीं। इसके अलावा, यह जानना संभव है कि क्या कोई व्यक्ति गुरु प्राप्त कर सकता है या नहीं। जातक स्वयं भौतिक शरीर और मनोविज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति की सोच हमेशा अंदरूनी होगी। वह अपने भीतर के बारे में सोचता है जिसका प्रतिनिधित्व सकारात्मक ऊर्जा द्वारा जाना जा सकता है।

 

कुंडली में 5 वां भाव आत्मा ( जीवात्मा ), मंत्र शक्ति और मन का प्रतिनिधित्व करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति योग और ध्यान (ध्यान) जैसी क्रियाओं को अपनाकर अपने मन को नियंत्रित करता है। वह अपने पिछले कर्मों को मंत्र पाठ के साथ शुद्ध करता है। अंत में उसका मन स्थिर हो जाएगा और व्यक्ति समझ जाता है कि वह आत्मा (जीवात्मा) है लेकिन भौतिक शरीर नहीं। 5 वाँ भाव भी सार्वभौमिक प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है। कुंडली में 9 वां भाव उच्च आध्यात्मिक ज्ञान, दर्शन और आत्मा के विस्तार का प्रतिनिधित्व करता है। 5 वें भाव द्वारा दर्शाई गई साधनाएं 9 वें भाव से प्राप्त आध्यात्मिक प्राप्तियों की ओर लेकर जाती है। 12 वां भाव मोक्ष (मोक्ष), मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा, पिछले जीवन क्रियाओं (कर्म) और जन्म लेने की संख्या का प्रतिनिधित्व करता है।

 

आध्यात्मिक वृद्धि ग्रहों द्वारा भी जानी जा सकती है। बृहस्पति, चंद्रमा, सूर्य। इन सभी ग्रहों में से बृहस्पति बहुत महत्वपूर्ण है और यह आध्यात्मिक व्यक्ति की संपूर्ण कुंडली पर विशेषाधिकार रखता है। आत्मा की यात्रा और आध्यात्मिकता देखने के लिए गुरु सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है। यह भौतिक धन का कारक ग्रह तो है ही साथ ही यह आध्यात्मिक प्रगति भी देता है। बृहस्पति गुरु (ईश्वरीय मार्गदर्शक), धर्म और दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है। बृहस्पति पिछले जन्मों में अपने अच्छे कार्यों के कारण व्यक्ति द्वारा प्राप्त उपलब्धियों का भी प्रतिनिधित्व करता है।

 

चंद्रमा व्यक्ति के मनोविज्ञान और भावनात्मक स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। यदि चंद्रमा कुंडली में सुस्थित हो तो व्यक्ति का मन स्थिर रहता है और उसकी अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण होता है। इसे आध्यात्मिक उन्नति का प्रथम कदम कहा जा सकता है। सूर्य ग्रह आत्मा की शक्ति और आत्मा के हित का प्रतिनिधित्व करता है। यह उन अनुभवों का भी प्रतिनिधित्व करता है जो मानव शरीर लेने से पहले आत्मा ने अनुभव किए थे। यह वर्तमान जन्म में आत्मा के अद्वितीय कार्य या उद्देश्य को भी दर्शाता है। केतु मृत्यु के बाद जीवन में रुचि का प्रतिनिधित्व करता है। यह पिछले जन्मों से व्यक्ति द्वारा अर्जित आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है।

 

ईश्वर के निकट रहने वाले व्यक्तियों को आध्यात्मिक पुरुष के नाम से जाना जाता है। अनुभव में यह पाया गया है कि आध्यात्मिक व्यक्तियों की कुंडलियों में शुभ ग्रह का प्रभाव सामान्य से अधिक पाया गया है। अनेकों साधु, संतों, सिद्ध पुरुषों, योगियों एवं उच्च स्तरीय महापुरुषों की जन्मकुंडलियों का सूक्ष्म अध्ययन यह कहता है कि इन व्यक्तियों की कुंडली में अधिकतर ग्रह उच्च राशि, स्वग्रही, मूलत्रिकोण राशि, केंद्र और त्रिकोण भाव में स्थित होते है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में आध्यात्मिक ग्यान का कारक गुरु है, यह ग्यान और विद्या का भी कारक ग्रह है।

 

आधात्मिक सिद्ध पुरुषों की कुंडली में गुरु ग्रह की स्थिति विशेष विचारणीय होती है। अत: गुरु का बली और शुभ ग्रहों से दृष्ट होना आवश्यक माना गया है। आध्यात्मिक विद्या का अध्ययन करने के लिए लग्न भाव, लग्नेश, पंचम भाव एवं पंचमेश की स्थितियों का विचार करना चाहिए। लग्न भाव से व्यक्तित्व और चारित्रिक विशेषताओं को जाना जा सकता है। लग्नेश की स्थिति व्यक्ति के व्यवहार की जानकारी देती है। जन्मकुंडली का पंचम भाव पूर्व जन्म के पुण्य कर्मों का भाव है। पूर्व जन्म के संचित कर्मों को यहां से जाना जाता है। पूर्व जन्म के आभासों को भी इस भाव से ही जाना जा सकता है। देव उपासना के लिए भी इसी भाव का विचार किया जाता है।

 

पंचम भाव से पंचमेश और गुरु ग्रह या बुध ग्रह का संबंध बनें तो व्यक्ति पूर्व जन्म के कर्मों के माध्यम से ग्यान प्राप्त करता है। जैसे भगवान श्री कृष्ण की कुंडली के पंचम भाव में बुध उच्चस्थ स्थित था और भगवान श्रीराम की कुंडली में पंचमेश मंगल उच्चस्थ है। लग्नेश चंद्र है जो लग्न भाव में उच्चस्थ गुरु के साथ स्थित है। आद्य शंकराचार्या जी की कुंडली में पंचमेश मंगल, भाग्य में तथा लग्नेश चंद्र लग्न में स्वराशि में स्थित है। श्रीरामकॄष्ण जी की कुंड्ली में पंचमेश  बुध लग्न में तथा लग्नेश शनि भाग्य भाव में उच्चस्थ है।

 

मां आनंदमयी की कुंड्ली में गुरु उच्चस्थ राशि का पंचम भाव में था। तथा चंद्र पंचमेश होकर नवम भाव में था। गौतम बुद्ध की कुंडली में पंचमेश मंगल लग्न में और लग्नेश चंद्रमा केंद्र में है। विवेकानंद जी की कुंडली में पंचमेश मंगल स्वग्रही तथा लग्नेश गुरु लग्न भाव में है। उपरोक्त संतों ने अपने आध्यात्मिक बल के आधार पर अपने ग्यान का पूरा लाभ उठाया। इसके अतिरिक्त इन भावों और भावेशों के अलावा नवम भाव, नवमेश, द्वादश भाव, द्वादशेश का भी सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। 

 

नवम भाव पिता भाग्य और गुरु एवं परम्परागत विद्या, इष्ट कृपा और भगवतकॄपा प्राप्ति का स्थान है। तथा द्वादश भाव मोक्ष, अंतिम लक्ष्य, यात्रा एवं मृत्यु का भाव है। जातक की मृत्यु कब होगी, कैसे होगी, और किस साधनों से होगी यह सभी द्वादश भाव से जाना जा सकता है। व्यक्ति की निद्रा का स्तर, सपनों की स्थिति और मानसिक चिंताओं की जानकारी इसी भाव से ली जा सकती है। बारहवें स्थान में केतु मोक्ष कारक कहा गया है। जबकि राहु जन्मांतर के चक्रों में भट्काता है। बारहवें भाव में शुभ ग्रह की स्थिति कम कष्टमय मृत्यु देती है तो अशुभ ग्रह अधिक कष्ट्मय मृत्यु का सूचक है।

 

 



Posted By:Acharya Rekha Kalpdev






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