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सन्तान प्राप्ति का काल निर्धारण

 

सृष्टि के सृजन का आधार ही संतान की प्राप्ति है। जो सृष्टि के जन्म समय से ही निरन्तर चली आ

रही है। अनादिकाल से आज तक मनुष्य द्वारा मनुष्य की संरचना के रहस्य की जटिलता के समक्ष इस

भूतल का समग्र विज्ञान मौन है। संतति की कामना, व्यक्ति की स्वाभाविक अभिलाषा एवं मूलभूत इच्छा

होती है। मनु आदि ऋषि गणों ने भी संतान की उत्कट अभिलाषा के रुप में स्वीकार किया है, क्योंकि

संतान के रुप में मनुष्य स्वयं को नए स्वरुप में रुपान्तरित करता है। शकुंतला दर्शन में शकुंतला ने

स्पष्ट कहा है कि माता अपने गर्भ से संतान रुप में अपने पति को ही जन्म देती है। संतान प्राप्ति की

अनिवार्यता का मंगलगान समस्त सम्बन्धित शास्त्रों में व्याख्यायित है। सदाचारी एवं योग्य संतान के

अभाव में व्यक्ति को सदगति अथवा मोक्षगति से वंचित ही रह जाता है। इसके साथ ही वंश परम्परा का

यथार्थ, कुलगौरव का उल्लास, सामाजिक प्रतिष्ठा का अलंकार संतान प्राप्ति के सार्वभौमिक सत्य पर

आधारित है जो मानवता के इतिहास को आगे ले जाता है। वास्तव में संतान ही भविष्य की संरचना का

स्थापना स्तम्भ है। वैदिक काल हो या आधुनिक काल संतान के बिना कोई धर्म, कर्म और पारिवारिक

कार्य पूर्ण नहीं होते हैं। दांपत्य जीवन का सर्वोत्तम प्रतिफल है संतति की संरचना और उत्पत्ति। भौतिक

उपलबधियों, कौतुम्बिक विस्तार, सामाजिक सम्मान, वंश परम्परा का आधार, वृद्धावस्था का सहारा होने

के साथ साथ संतति, सर्वांग समृद्धि की सम्पन्नता की स्थापना का सबलतम साधन है जिसके महत्व से

प्राय: संततिवान पूर्णत: परिचित नहीं होते, परन्तु संततिहीन सम्पति संतति सुख की मह्त्ता से किंचित भी

अनभिज्ञ नहीं रह पाते। विवाह के उपरान्त, सर्वाधिक उत्कण्ठा और कौतुहल का विषय संतति प्राप्ति ही

होती है। दांपत्य जीवन में प्रवेश्फ़ प्राप्त कर लेने के उपरान्त संतति के गर्भस्थ होने की ही प्रतीक्षा,

अत्यधिक व्याकुलता के साथ होती है। पुरुष और नारी की महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही

प्रशंसित होती है। संतान, पुरुष को पितृत्व का प्रसाद और नारी को मातृत्व की महिमा और गरिमा से

अलंकृत करती है। साथ ही संतान मोक्ष प्राप्ति के साथ साथ दु:ख से मुक्ति पाने और सुख में वृद्धि

करने के लिए, संतान की संभावना और प्राप्ति समय काल का निर्धारण करने की जिज्ञासा प्रत्येक

व्यक्ति को रहती है।

 

ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है। ज्योतिष की प्रशंसा में सभी आचार्यों ने कहा है-

लक्षं वेदाश्चत्वारो लक्षं भरत एव च I

लक्षं व्याकरणं प्रोक्तं चतुर्लक्षन्तु ज्यौतिषम II (चरणब्यूह)

मनुष्य में उक्त ज्ञान के साथ अपने बारे में जानने के जिज्ञासा रहती है। जब चिकित्सा के सभी उपाय

असफल हो जाते है तो प्रभावित व्यक्ति ज्योतिष शास्त्र की शरण में चला जाता है। जीवन के किसी भी

क्षेत्र में दु:ख सहना न हो व्यक्ति का स्वभाव है और न ही व्यक्ति की प्रवृति है। दु:ख से मुक्ति और

सुख प्राप्ति के लिए व्यक्ति ज्योतिष मर्मज्ञ से अपनी कठिनाई और समस्या का सुखद हल जाना चाहता

है। इस स्थिति में ज्योतिषी ही है जो व्यक्ति की ग्रह दशा देखकर, अपने ज्ञान के आधार पर सत्य का

उद्घाटन करता है और संतान की संभावनाओं में बाधक तत्वों का उल्लेख करता है। फलित ज्योतिष में

निपुण व्यक्ति ही सटिक भविष्यवाणी कर सकता है।

 

संतान और ज्योतिष शास्त्रीय योग

सा एकया पृष्टो दशभि: प्रत्युवाच

ऋणमस्मिन्संनयत्यमृत्तवं च गच्छति ---सर्वांग चिन्तन

पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येच्चेज्जीवतो मुखम

अर्थात - पिता उत्पन्न हुई जीवित संतान का मुख देख लेता है तो उस अपा अपने सारे ऋण सौंप देता है

और अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

 

यावन्त: पृथिव्यां भोगा यावन्तो जातवेदसि

यावन्तो अप्सु प्राणिनां भूयान्पुत्रे पितुस्तत: ---सर्वांग चिन्तन

प्राणियों के जितने भोग (सुख के साधन) पृथ्वी में हैं, जितने अग्नि में हैं, जितने जल में हैं, एक पिता

के लिए संतान में उससे कहीं अधिक हैं।

 

शाश्वत्पुत्रेण पितरोअत्यायन्बहुलं तम:

आत्मा हि जज्ञ आत्मन: स इरावत्यतितारिणी ---सर्वांग चिन्तन

अर्थात - पिता पुत्र के द्वारा बार बार अत्यंत (इहलोक और परलोक संबंधी) दुखों को पार कर जाए हैं।

क्योंकि (पिता) स्वयं ही पुत्र रुप में उत्पन्न होता है। वह (पुत्र) समुद्र में नाव के समान (पार कराने वाला)

है।

 

पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा सा मातरम

तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ---सर्वांग चिन्तन

पति ही पत्नी के गर्भ में प्रवेश करता है और उस माता के गर्भ से फिर नया होकर दसवें माह में उत्पन्न

होता है।

 

अमित की पत्नी मधु की कुंडली का श्लोक और गीता की कुंडली का श्लोक

पंचमेश के लग्नगत होने का फल

लग्नगते पच्चमपे प्रसिद्धस्तोकतनयपरिकलितम

शास्त्रविदण वेदविदं सुकर्मनिरतं तथा कुरुते मानसागरी/ अध्याय --१

जिस जातक के जन्मकाल में पुत्रभाव का स्वामी लग्नगत हो उसको कम पुत्रों की प्राप्ति होती है, परन्तु

सब पूर्ण प्रसिद्ध होते हैं, जिनको देखने मात्र से ही उनकी आत्मा प्रसन्न रहती है। स्वयं शास्त्रों के ज्ञाता

और वेद को भी जानने वाले होते हैं, अच्छे कर्मों में हमेशा लीन रहते हैं।

 

मोनिका जी कुंडली का श्लोक

 

तनयगतस्तनयपतिर्मतिन्यं मानितं जनं कुरुते

सुतकलितं प्रकटजनविख्यातं मानवं कुरुते ---मानसागरी/ अध्याय --५

जिसके जन्मसमय में पंचमेश पंचमभावगत हो वह जातक बहुत बुद्धिमान, लोगों में मान्य, पुत्रों से

सुशोभित, बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोगों में भी वह अत्यंत विख्यात होता है।

तन्वी मेम कुंडली का श्लोक

तनयपतौ सप्तमगे स्वसुता: सुभगाश्च देवगुरुभक्ता:

प्रियवादिनी सुशीला नरस्य ननु जायते दयिता ---मानसागरी/ अध्याय ----७

जिसका पंचमेश सप्तमभाव में स़्थित हो उसे अनेक अतिसुंदर पुत्रों की प्राप्ति होती है, वे सब देवता,

ब्राह्मण और गुरु के अनन्यभक्त होते हैं तथा उसकी स्त्री भी मधुरभाषिणी एवं सुशील होती है, यह बहुत

ही श्रेष्ठ योग है।

लग्नेशे पुत्रभावस्थे पुत्रेशे बलसंयुते

परिपूर्णबले जीवे पुत्रप्राप्तिर्न संशय: ---भारतीय कुंडली विज्ञान ---पच्चमभाव विचार--४२३।।।

जिस किसी की कुंडली में यदि पंचमेश गुरु पूर्ण बलवान हो अथवा लग्नेश से देखा जाता हो, तो इस योग

ग्रहयोग से युक्त कुंडली वाले मनुष्य को "पुत्र प्राप्ति होगी" बतानी चाहिए।

 

पुतुर्धनं याति सुखे सभानौ पुत्रे शशाके: मरणं च मातु:

सुते शुभे शोभनदृष्टियोगे पुत्रं ददात्येव तदा तदीशे ---पच्चमभाव विचार--४२३।।।

जिस किसी की कुंडली में यदि पंचम भाव अथवा पंचमेश अथवा गुरु शुभग्रह से देखा जाता हो अथवा युत

यो, तो इस प्रकार के ग्रह योग युक्त कुंडली वाले मनुष्य को नि:संशय पुत्र प्राप्ति कहना चाहिए।

उपरोक्त कुंडली में यह योग पूर्णत: लग रहा है। पंचम में शुभ ग्रह शुक्र, पंचमेश गुरु शुभ ग्रह बुध के

साथ और दोनों पर अन्य किसी अशुभ ग्रह का कोई प्रभाव नहीं है। अत: आज यह एक पुत्र संतान की

माता है।

सोनम जी की कुंडली का श्लोक

 

व्ययगे पंचमाशीशे जात: पुत्र सुखोज्झित:

शुभं शुभश्च संयुक्त भक्तिमान अल्पपुत्रवान----- बृहतपाराशरहोराशास्त्र, अध्याय २५, श्लोक ५५

जिसके जन्मकाल में पंचमेश लाभ भाव में विद्यमान हो तो वह जातक, शूरवीर, पुत्र तथा मित्रों के साथ

अधिक सहानुभूति रखने वाला, गायन-वादन आदि कलाओं का ज्ञाता एवं अल्पपुत्र वाला होता है।

 

आयु अनुसार संतान प्राप्ति के ज्योतिषीय योग

सुतेशे केंद्र भवस्थे, कारकेण समंविते

षदत्रिंशे त्रिंशदब्दे च पुत्रोत्पत्ति विनिर्दिशेत --बृहत्पाराशर होराशास्त्र १६/१९

पंचमेश केंद्र स्थानों (१,४,७,१०) में हो तथा पुत्रभाव के कारक ग्रह गुरु से युत हो तो यह योग बनता है.

इस योग में जन्म लेने वाले जातक को तीस वर्ष की आयु के बाद एवं कई बार छतीस वर्ष की आयु के

बद पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है.



Posted By:Acharya Rekha Kalpdev






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